भ्रष्टाचार पर लेनी होगी श्योलपुर जिले के डीएम से सीख भूपेंद्र कंडारी

समाज कल्याण विभाग उत्तराखंड ने दो दिन पूर्व सार्वजनिक सूचना में कहा कि जो व्यक्ति दो जगह से पेंशन ले रहे हैं उनकी एक पेंशन बंद होगी और दोषियों पर कार्यवाही होगी। समाज कल्याण विभाग उत्तराखंड में छात्रवृत्ति घोटाला और पेंशन घोटाला का मामला अक्सर ही सामने आता है। हाल ही में पेंशन घोटाले का मामला भी सामने आया है। सवाल पर नए नवेले समाज कल्याण मंत्री खजान दास ने दावा किया कि छात्रवृत्ति घोटाला हो या फिर पेंशन घोटाला पूरे मामले की जांच करायेंगें और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही होगी। जबकि समाज कल्याण मं़त्री यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि पूर्व के घपले-घोटालों के आरोपी वर्तमान में मलाइदार पदों पर आसीन हैं और ऐसे हालात में सात-आठ महीने के कार्यकाल में क्या वह कुछ कर पायेंगें ?
हम सभी जानते हैं कि मध्य प्रदेश का श्योपुर जिला आजकल चर्चाओं में है। श्योपुर जिले से सामने आया बाढ़ राहत घोटाला और इस मामले में जिस प्रकार की कठोर और व्यापक प्रशासनिक कार्रवाई की गई, उसने पूरे देश में एक नई उम्मीद जगाई है। यह घटना केवल एक सटीक घोटाले की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस निर्णायक मोड़ का संकेत है जहां से देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध वास्तविक और प्रभावी लड़ाई की शुरुआत हो सकती है। इस पूरे मामले में सबसे सराहनीय भूमिका जिला कलेक्टर अर्पित वर्मा की रही, विशेष रूप से उनके द्वारा दिखाई गई दृढ़ इच्छाशक्ति की। कलेक्टर ने न केवल इस घोटाले की गहन जांच करवाई, बल्कि 18 पटवारियों के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी देकर एक स्पष्ट संदेश दिया कि भ्रष्टाचार के प्रति कोई नरमी नहीं बरती जाएगी। जांच में स्पष्ट हुआ कि तत्कालीन तहसीलदार अमिता सिंह तोमर और उनके अमले में शामिल पटवारियों ने फर्जी बाढ़ पीड़ितों के नाम पर करीब 2 करोड़ 57 लाख रुपये की राहत राशि जारी कर दी। यह पैसा असल जरूरतमंदों तक पहुंचने के बजाय परिचितों और रिश्तेदारों के फर्जी खातों में डाल दिया गया। मामले में तहसीलदार के साथ ही 28 पटवारियों समेत कुल 110 लोगों को आरोपी बनाया गया । कार्रवाई के दौरान कुछ पटवारियों को बर्खास्त भी किया गया, जबकि कुछ ने घोटाले की रकम ब्याज सहित जिला प्रशासन के खाते में वापस जमा कर दी। इसके बावजूद जांच एजेंसियों ने इसे गंभीर आर्थिक अपराध मानते हुए आपराधिक कार्रवाई की है।
यह निर्णय केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि एक नैतिक घोषणा है कि अब राज्य की व्यवस्था में ईमानदारी को प्राथमिकता दी जाएगी। इसके साथ ही विभागीय जांच के आदेश और नौकरी से बर्खास्तगी की सिफारिश ने यह सुनिश्चित किया कि दोषियों को हर स्तर पर जवाबदेह ठहराया जाएगा। पूरे भारतवर्ष में अनेकों सरकारी कर्मचारियों पर कुछ अपवाद छोड़कर अगर हम संज्ञान लें तो एक सामाजिक पहलू भी है, जिस पर ध्यान देना आवश्यक है। अक्सर देखा जाता है कि कई सरकारी कर्मचारियों की जीवनशैली उनके आधिकारिक वेतन से कहीं अधिक उच्च होती है, जिससे यह संदेह उत्पन्न होता है कि अतिरिक्त आय के स्रोत क्या हैं ? यदि इस दिशा में नियमित निगरानी और संपत्ति का ऑडिट किया जाए, तो भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सकता है।
यह घटना लाखों ईमानदार सरकारी कर्मचारियों के लिए भी प्रेरणा है, जो व्यवस्था में सुधार लाना चाहते हैं, लेकिन अक्सर दबाव और भय के कारण चुप रहते हैं। भ्रष्टाचार को यदि एक बीमारी माना जाए, तो यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यह कोविड महामारी या कैंसर से भी अधिक खतरनाक है, क्योंकि यह धीरे-धीरे पूरे तंत्र को अंदर से खोखला कर देता है इस बीमारी का सबसे बड़ा कारण केवल व्यक्तिगत लालच नहीं, बल्कि सामूहिक मिलीभगत है, जिसमें निचले स्तर से लेकर उच्च अधिकारियों तक एक श्रृंखला बन जाती है।
उत्तराखंड के परिपेक्ष्य में अगर हम देखें तो पुलिस आंकड़ों में साल 2022 अप्रैल महीने से सितंबर साल 2025 तक टोल फ्री नंबर 1064 पर 9224 शिकायतें मिली जिसमें विजिलेंस के एंगल के तहत 1421 शिकायतें मिली, इसके अलावा 8005 नॉन विजिलेंस एंगल की शिकायतें मिली। नॉन विजिलेंस एंगल के शिकायतों को 1905 सीएम हेल्पलाइन नंबर पर कार्रवाई के लिए शिफ्ट किया गया लेकिन विजिलेंस के एंगल से 1421 शिकायतों में मात्र 62 में ट्रैप और अन्य में जांच की कार्रवाई की गई। वहीं साल 2025 में 1060 टोल फ्री नंबर पर 331 शिकायतों में से 12 पर कार्रवाई ट्रैप विजिलेंस ने की। उत्तराखंड में सबसे बड़ी बात यह है कि विजिलेंस विभाग पुलिस विभाग के तहत आता है। ऐसे में सबसे ज्यादा शिकायतें पुलिस विभाग की है। जिसके बाद राजस्व विभाग, पंचायती राज विभाग, राज्य कर विभाग, वन विभाग, शहरी विकास विभाग, विद्युत विभाग, स्वास्थ्य विभाग, परिवहन विभाग, आबकारी विभाग, सहकारिता विभाग, समाज कल्याण विभाग, वित्त विभाग, सैनिक कल्याण विभाग, आवास विकास परिषद, खाद्य आपूर्ति विभाग, लघु सिंचाई विभाग, लोक निर्माण विभाग, शिक्षा विभाग, कृषि विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध लगातार भ्रष्टाचार संबंधित 1064 पर शिकायतें मिली हैं।
उत्तराखंड समाज कल्याण विभाग में भ्रष्टाचार की स्थिति हमेशा ही गंभीर रही है। यहां करोड़ों रुपये की बंदरबांट और फर्जीवाड़े के मामले सामने आए हैं। कैग की रिपोर्ट ने विभाग में बड़ी वित्तीय अनियमितताओं का खुलासा किया है, जिसमें अपात्र लोगों को लाभ पहुँचाना शामिल है। प्रमुख घोटालों में छात्रवृत्ति घोटाला, वृद्धावस्था पेंशन में फर्जीवाड़ा, और मृत लोगों के नाम पर पेंशन निकालकर लगभग ₹5 करोड़ का गबन करने जैसे मामले उजागर हुए हैं। विजिलेंस और अन्य जांच एजेंसियों द्वारा लगातार की जा रही कार्रवाई के बावजूद विभाग में भ्रष्टाचार एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। सरकार ने पेंशन प्रणाली को और अधिक सख्त बनाने और जांच के बाद रिकवरी की प्रक्रिया तेज करने का दावा किया है। श्योलपुर जिले की एक घटना नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक चेतावनी और एक अवसर दोनों है। चेतावनी इसलिए कि यदि भ्रष्टाचार को समय रहते नहीं रोका गया, तो यह व्यवस्था को पूरी तरह खोखला कर देगा, और अवसर इसलिए कि यदि इसी प्रकार की सख्त और निष्पक्ष कार्रवाई देशभर में की जाए, तो एक स्वच्छ और पारदर्शी प्रशासन की स्थापना संभव है। वर्तमान में आवश्यकता इस बात की है कि हर राज्य, हर जिला और हर तहसील इस घटना से प्रेरणा ले और श्योलपुर जिले के डीएम से सीख लेकर अपने स्तर पर सुधार की प्रक्रिया शुरू करे।



